Saturday 12 May 2012

भंवरी... स्त्री है, दलित है, इसलिए ब्लैकमेलर है, खलनायिका है...



जनतंत्र का जामा ओढ़े इस आजाद कहे जाने वाले देश के कुछ "पंच परमेश्वरों" ने करीब सत्रह साल पहले एक भंवरी का जो हश्र किया था, वह शायद तमाम भंवरियों की उस "नियति" का बयान था, जो मनुओं ने बड़े जतन से तय किया और आज भी उसे सहेज कर रखा है। सामूहिक बलात्कार की पीड़ा के साथ मर-जी रही एक स्त्री को "झूठी" घोषित करते हुए मनु-भक्तों ने जब कहा होगा कि "ऊंची जाति के लोग किसी नीच जाति वाले को छू नहीं सकते तो भंवरी का बलात्कार कैसे कर सकते हैं" तो क्या ठीक वही वक्त नहीं रहा होगा, जब उन "पंच-परमेश्वरों" के मुंह पर थूक दिया जाना चाहिए था? क्या भंवरी का कसूर यह था कि एक साथिन के तौर पर वह समाज को जागरूक करने के मकसद से घर की दहलीज के बाहर निकल पड़ी थी, और इससे भी ज्यादा वह देश के कानूनों के साथ बाल-विवाह की मुखालफत कर रही थी? इंसानियत, किसी सभ्य समाज के तकाजे और देश के कानून की किताब चाहे जो कहें, यह न केवल समाज के ठेकेदारों के नंगा नाचने के लिए काफी था, बल्कि न्याय की मूर्ति कहे जाने वालों ने भी भारत के संविधान और कानून की जगह अपने सड़े हुए दिमाग में अपने पता नहीं किसकी "स्मृति" घुसेड़ रखी थी।

और आज जब फिर एक मार डाली गई भंवरी को दूसरे पैमानों से उसी स्मृति की कसौटी पर पेश किया जा रहा है, तो लगता है कि भंवरी की सामाजिक हैसियत में मरने-जीने वाले तमाम तबकों के पास इस समूची व्यवस्था को खारिज करने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लगभग दो दशक पहले सामंतों की शिकार भंवरी बाई पर झूठी होने का आरोप लगाने वाले मनुपुत्रों को न तब शर्म आई थी, न आज के समाज के "आधुनिक" कहे जाने वाले व्यवस्था के झंडाबरदारों को यह कहते हुए शर्म आती है कि भंवरी देवी ब्लैकमेलर थी, भंवरी देवी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की शिकार हुई।

हां, वह महत्त्वाकांक्षी थी...

हां, भंवरी देवी महत्त्वाकांक्षी थी, क्योंकि जिस खानाबदोश नट जाति में वह पैदा हुई थी, उसकी पुश्तैनी संस्कृति को निबाहने के बजाय उसने स्कूल जाना पसंद किया था; क्योंकि जिस राजस्थान में अनुसूचित जातियों के बीच साक्षरता कुल आठ फीसद है और खासतौर पर नट जाति में सिर्फ नाम के लिए, और उनमें भी अठासी फीसद बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं, भंवरी देवी ने पहले हाई स्कूल की परीक्षा पास की, फिर एएनएम के लिए मानक जांच परीक्षा में अपनी योग्यता साबित की; क्योंकि जोधपुर की कुल 617 में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महज 47 एएनएम में दर-दर भटकने के लिए जानी जाने वाली नट जाति की भंवरी शायद अकेली थी; और क्योंकि उसने अपनी तनख्वाह का इस्तेमाल अपने बच्चों को स्कूल भेजने में करना ज्यादा जरूरी समझा था। इसके अलावा, इस तथाकथित समाज के हाशिये के बाहर जीने वाली नट समुदाय में पैदा होने के बावजूद उसने गीत-संगीत के क्षेत्र में दखल दिया; उसमें सृजन का जज्बा था और उसने अपनी रचनात्मकता साबित की थी; उसने संगीत के कई अल्बम में काम किया था।

और अपनी इन्हीं "महत्त्वाकांक्षाओं" को जिंदा रखने के लिए वह अपने इलाके के विधायक मलखान सिंह से मिली थी। वजह सिर्फ यह थी कि बतौर एएनएम उसका तबादला उसके घर से बहुत दूर कर दिया गया था और वह उसे रुकवाना चाहती थी। इस तरह या दूसरी जरूरतों के लिए लोगों का अपने क्षेत्र के जन-प्रतिनिधियों से अनुरोध करना एक आम रिवायत है। लेकिन वह कौन-सी सामाजिक-राजनीतिक नैतिकता या कानूनी नियम-कायदे किसी जन-प्रतिनिधि को यह छूट देती है कि वह फरियादी महिला के लिए सिफारिश करने के बदले उसे "यौन-सहयोग" के लिए मजबूर करे?

कुछ समय पहले बिहार में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लगभग पैंतीस हजार प्रशिक्षित शिक्षकों को बहाली दी गई। इस बहाली में बड़ी तादाद में वैसी महिलाएं हैं जिन्हें अपने आवास तो दूर, बल्कि अपने गृह-जिले से भी दो या ढाई सौ किलोमीटर दूर के स्कूल में पदस्थापित किया गया। अव्वल तो महिलाओं को इतनी दूर नियुक्ति देने का फैसला कितना सही है, दूसरे ऐसी कितनी महिलाएं होंगी, जिन्हें इस तरह के पदस्थापन से शिकायत नहीं होगी। क्या हमने अपने समाज और परिवेश को ऐसा सहज और सुरक्षित स्वरूप दे दिया है कि ऐसी स्थिति में किसी महिला के दिमाग में "इतनी दूर" जाने को लेकर कोई परेशानी नहीं पैदा हो? और तीसरे कि ऐसे फैसलों के पीछे शोषण और घूसखोरी की कौन-सी पटकथा तैयार की जाती है, क्या यह किसी से छिपा है?

तो भंवरी देवी भी अपने घर से दूर कर दिए गए तबादले को रुकवाने के लिए महज प्रार्थना करने गई थी और मलखान सिंह एक सत्ता केंद्र था जो भंवरी का यह काम करा दे सकता था। क्या यह संभव नहीं है कि अपने काम के लिए बार-बार दौड़ती भंवरी थक कर मलखान के जाल फंस गई हो? अगर नहीं तो मलखान सिंह ने भंवरी को मदेरणा से किस मकसद से मिलवाया? मंत्रियों और विधायकों के लिए ऐसा कौन-सा विशेष नियम है जो उन्हें "एक वयस्क की सहमति" के नाम पर महिलाओं का यौन-शोषण करने की आजादी देता है? क्या अब इस बात की भी जांच किए जाने की जरूरत है कि तथाकथित जन-प्रतिनिधियों की काल-कोठरी में कितनी भंवरी देवियां दफन हो गई होंगी?

सहमति का जाल...

इतना तय है कि "तकनीकी तौर पर" दो वयस्कों के बीच "आपसी सहमति" पर आधारित संबंधों का मामला होने की वजह से भंवरी के साथ जो हुआ, व्यवस्था उसे बलात्कार नहीं कहेगी। लेकिन यहां अजीब कानून है जहां शादी का झांसा देकर हासिल की गई यौन-संबंधों की सहमति को बलात्कार माना जा सकता है, लेकिन अगर कोई अपने पद या हैसियत का इस्तेमाल कर किसी महिला को अपने जाल में फंसाता है और उसे "सहमतिजन्य संबंध" का नाम देता है तो वह कहीं से भी बलात्कारी नहीं है!

अस्सी के दशक में बलात्कार कानूनों में सुधार के मसले पर हुई बहस में यह सवाल उठा था कि अगर कोई पुरुष अपने ऊंचे पद या हैसियत का दुरुपयोग कर अपनी किसी महिला कर्मचारी पर यौन-संबंध बनाता है तो उसे भी बलात्कार माना जाए। लेकिन आज जब राजनीतिक हलकों से लेकर नौकरी या कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन-शोषण के लिए "सहमतिजन्य संबंध" के दलील की आड़ में ऐसे मामले आम होते जा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि तब वह प्रस्ताव खारिज करने के पीछे व्यवस्थावादियों की क्या मंशा रही होगी।

समरथ को नहि दोष गुसाईं...

इस लिहाज से देखें तो भंवरी देवी के साथ जो हुआ, वह भारतीय राजनीति में घुसी पुरुष नीचताओं और आपराधिक जालसाजियों का एक प्रतिनिधि मामला है। इसमें सत्ता और शक्ति के इस्तेमाल से दबाव बना कर सेक्स हासिल करना है, हत्यारों के गिरोह के साथ चुने गए जनप्रतिधियों और सरकार के ऊंचे ओहदे पर बैठे मंत्रियों का गठजोड़ है, ताकतवर जातियों द्वारा एक कमजोर जाति की महिला का शोषण है, और यह सब करते हुए भी तथाकथित जनप्रतिनिधियों का जनता के बीच इतना लोकप्रिय बने रहना है। ध्यान रखने की बात है कि महिपाल सिंह मदेरणा और मलखान सिंह को सही ठहराते हुए न सिर्फ इनके परिवार वाले, बल्कि बड़ी तादाद में इनके समाज के लोगों ने भी जुलूस निकाल कर मदेरणा और मलखान का पक्ष लिया।

1995 जब इस देश के न्याय के मंदिर कहे जाने वाली एक अदालत ने जब भंवरी बाई के बलात्कारियों को रिहा किया था तो एक तत्कालीन भाजपा विधायक ने जयपुर में विजय जुलूस निकाला था और भाजपा की ही महिला संगठन ने भी उस रैली में हिस्सा लिया और भंवरी बाई को "झूठी" बताया। इस बार जब कानून ने भंवरी के हत्यारों को यों ही बख्श देने की इजाजत नहीं दी तो मदेरणा और मलखान को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद मदेरणा और मलखान के समाज के लोगों ने जिस तरह हजारों की तादाद में अपने "पवित्र" नेताओं के समर्थन में जुलूस निकाल कर उन्हें निर्दोष घोषित करने की मांग की, उससे इस देश की त्रासदी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ब्लैकमेलर भंवरी की अकूत जायदाद...

जब भंवरी और मदेरणा की सीडी का किस्सा सामने आया तो न सिर्फ भंवरी की हत्या के आरोपियों और उसके परिवार-समाज के लोगों, बल्कि सीबीआई तक ने भंवरी को "ब्लैकमेलर" कहा। सीबीआई के निदेशक ने इस मामले में हॉलीवुड की एक फिल्म "सेक्स लाइज एंड वीडियोटेप" का उदाहरण पेश किया और इसी आधार पर मीडिया और उसे "देव-वचन" मानने वालों ने इसे "ब्लैकमेल, राजनीतिक, सेक्स और सीडी" का सबूत मान लिया। कहा गया कि सेक्स सीडी खुद भंवरी ने बनवाई और उसे सार्वजनिक करने की धमकी देकर उसने इसमें शामिल लोगों से अकूत धन वसूला।

यानी राजनेताओं के पद, हैसियत, शक्ति और इसके बूते अपने ऐय्याशी के लिए जाल में फांस कर और उसके भरपूर शोषण करने के बाद मार डालने वाले तो "बेचारे", "मासूम" और "नायक" ही रहे, लेकिन जब भंवरी ने अपनी हैसियत बनाने की कोशिश की तो वह ब्लैकमेलर और खलनायिका हो गई।

अपनी सामाजिक और राजनीतिक सत्ताओं के दम पर रोज न जाने कितनी भंवरियों का शिकार करने वाले मदेरणाओं और मलखानों की महत्त्वाकांक्षा से तो देश और समाज प्रेरणा ग्रहण करता है, क्योंकि वह पुरुष है और भंवरी ने अपनी मजबूरी की जिंदगी की भरपाई एक खोखले सपने से करना चाहा, तो उसकी महत्त्वाकांक्षा मजाक और नफरत के काबिल है, क्योंकि वह स्त्री है।

खतरनाक महत्त्वाकांक्षाः प्रेरक कुकर्म

यों भी, हम जिस सामंती समाज और संस्कृति पर अपना सीना फुलाए फिरते हैं, उसमें सत्ताओं के तमाम कुकर्म भी "प्रेरक" होते हैं, और शासितों की चीखें भी दफन कर देने लायक मानी जाती हैं। इसी कसौटी पर भंवरी अव्वल तो स्त्री थी, दूसरे शासित थी और इससे भी ज्यादा एक ऐसी जाति में शुमार थी, जिसे "नीच" कहा जाता है। जाहिर है, भंवरी की महत्त्वाकांक्षा खतरनाक थी, क्योंकि वह सामाजिक सत्ताओं के पूरे भविष्य को उलट-पुलट कर दे सकती थी।

लेकिन छल के बल पर राज करने वालों के बरक्स भंवरी देवी सिर्फ उनका शिकार ही हो सकती थी, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की लड़ाई लड़ पाना उसके बूते की बात नहीं थी। इसलिए अपनी "महत्त्वाकांक्षी" होने की लड़ाई वह हारी और अपने शिकारियों के हाथों मारी गई।

जब उसकी हत्या का मामला खुला और उसके बाद उसके बच्चों ने कानूनी लड़ाई के लिए जिस वकील को मुकदमा सौंपा, तो वह वकील इसलिए भाग गया क्योंकि भंवरी के बच्चों के पास उसे देने के लिए फीस नहीं थी। यहां यह समझना मुश्किल है कि भंवरी ने "ब्लैकमेलिंग" के जरिए जो "अकूत" धन इकट्ठा किया था, वे सारे पैसे कहां चले गए! उसकी बेटी को क्यों स्कूल से निकाल दिया गया और उसके बेटे ने किसके डर से कॉलेज जाना बंद कर दिया। साथिन भंवरी का बेटा भी जब कॉलेज जाने लायक हुआ था तो दबंगों के बाल-बच्चों ने उसकी बार-बार पिटाई कर कॉलेज जाने से रोका।

यानी भंवरी की कहानी तब भी वहीं थी और अब भी वहीं है। क्या इसकी वजह इसके सिवा कुछ और भी हो सकती है कि दोनों भंवरी स्त्री है सो है, दलित भी है?

साथिन भंवरी को कहां इस बात का अंदाजा था कि पितृसत्ता, मर्दवाद और ब्राह्मणवाद के जिन अंधे पहरुओं के बीच खड़ी होकर वह एक अंधेरे समाज में अलख जगाने की कोशिश कर रही है, उनकी सत्ता ही अंधकार की वजह से कायम है। इसलिए उन्होंने अपनी सत्ता के खिलाफ खड़ी केवल साथिन भंवरी की नहीं, बल्कि शासित स्त्री और दलित की अस्मिता और सम्मान को कुचल डाला, ताकि हजारों सालों से कायम एक बर्बर और जुल्मी व्यवस्था कायम रखा जा सके। इस फर्जी और मक्कार व्यवस्था से बेखबर साथिन भंवरी ने जब इंसाफ की गुहार लगाई तो न सिर्फ बलात्कारियों के परिवार और समाज ने उसे "झूठी औरत" कहा, बल्कि इस आजाद देश के पंच-परमेश्वरों ने जो कहा, वह अब दुनिया के इतिहास में दर्ज है। क्या कोई सामाजिक व्यवस्था इस हद तक जंगली हो सकती है, जिसमें न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग न्याय नहीं करते, बल्कि न्याय का गला घोंटने और अपनी व्यवस्था को बचाने के लिए बेशर्मी की तमाम हदें लांघ जाते हैं?

आज भी तस्वीर में कितना फर्क आया है? खानाबदोश नट जाति की त्रासदी का सामना करती हुई भंवरी ने खुद पढ़ाई-लिखाई की, एएनएम बन गई और अपनी अगली पीढ़ी को उससे भी आगे ले जाने का सपना जमीन पर उतारने लग गई। लेकिन एक तबादला रुकवाने की कोशिश में वह कहां समझ पाई कि वह किस मर्द और सवर्ण सत्ता के जाल में फंसने जा रही है, जो उसके सामने महत्त्वाकांक्षाओं का टुकड़ा फेंक कर उसका शिकार करने के लिए घात लगाए बैठा था। भंवरी उस जाल में फंसी और आखिरकार मार डाली गई।

मर्द के बरक्स औरत...

एक अस्सी पार बूढ़े नारायण दत्त तिवारी की सेक्स सीडी बाजार में प्रसारित होती है, वह "सम्मानित" नेता बना आज भी सबसे अपनी पांव-पूजा कराता फिर रहा है, दूसरी ओर, एक सेक्स सीडी में जाल में फंसी भंवरी मार डाली जाती है और फिर भी ब्लैकमेलर और खलनायिका का दर्जा पाती है। भंवरी देवी के चरित्र की "जांच" करने के लिए बिना किसी की इजाजत के उसके बच्चों का डीएनए परीक्षण कराया जाएगा और साबित हो जाएगा कि भंवरी के एक बच्चे की वजह मलखान सिंह था। यानी कि यह पहले ही साबित हो चुका है कि भंवरी देवी ऐसे संबंधों की "अभ्यस्त" थी। दूसरी ओर, एक युवक गुहार लगाता फिरेगा कि नारायण दत्त तिवारी की डीएनए जांच कराओ, अदालत आदेश देगी कि नारायण दत्त तिवारी के डीएनए की जांच कराओ, पता लगाओ कि वह युवक तिवारी का बेटा है या नहीं! लेकिन सारे गुहार जाए भाड़ में... अदालत का आदेश ठेंगे पर...!!! कौन हिसाब मांगेगा इस "मर्द" से और "बाबा" से?

और भंवरी... महज इसलिए नफरत के काबिल है क्योंकि वह स्त्री है और इससे भी ज्यादा कि खानाबदोशी की नियति को कबूल करने के बजाय उसने "इंसानों" की तरह कुछ सपने देख लिए थे...!!!

बिहार के पूर्णिया जिले में भाजपा के एक विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या करने वाली रूपम पाठक और राजस्थान की इस भंवरी देवी के मामले में क्या फर्क है, सिवाय इसके कि रूपम पाठक ने मार डाला और भंवरी देवी मारी गई...!!!

अब मर चुकी भंवरी के लिए अदालत के पंच-परमेश्वर एक बार फिर क्या फैसला सुनाएंगे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मामले की जांच के कर्णधारों ने पहले ही भंवरी को ब्लैकमेलर और खलनायिका घोषित कर दिया है। यानी कहानी फिर वहीं की वहीं... एक भंवरी झूठी, एक भंवरी ब्लैकमेलर...! कहानी के शेष पात्र पवित्र देव.... भूदेव...!!!

खामोश...!!! अदालत जारी है...!!!

Monday 26 March 2012

गाली प्रेमी सामंतों के खिलाफ बगावत है पान सिंह तोमर...



स्पष्टीकरणः
"आप फिल्म को फिल्म की तरह देखतें हैं। आप समाज को भी फिल्म की तरह देखते हैं। ...मैं फिल्म को समाज की तरह देखता हूं। और समाज की राजनीति की तरह देखता हूं।"




"देल्ही बेली" बनाने के बाद अगर आमिर खान के हाथ में "पान सिंह तोमर" गई होती तो यह फिल्म कैसी बनी होती? यह खयाल मुझे "पान सिंह तोमर" के आखिरी दृश्य में "पान सिंह तोमर" यानी इरफान की मौत के साथ ही आया।

तिग्मांशु धूलिया की दूसरी फिल्में कैसी हैं, इसके बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। उनकी "पान सिंह तोमर" के कला या सरोकारी पहलू पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन मेरे दिमाग में इस फिल्म के खत्म होती ही "देल्ही बेली" या आमिर खान जैसे फिल्मकारों का ही नाम क्यों आया? "देल्ही बेली" अगर किसी वजह से याद रह जाती है तो सिर्फ इसलिए कि "गरीबी" का पाखंड जीते तीनों एलीट हीरो एक दूसरे को मां-बहन की सबसे वीभत्स गालियां ऐसे सहज भाव बोलते हैं जैसे किसी को तोहफे में फूल दे रहे हों; "देल्ही बेली" का एक "हीरो" एक स्त्री की कीमत लगाता है और पूरी सहजता से उसकी छातियां दबा कर चला जाता है; एक हीरो अपनी "प्रेमिका" की जांघों के बीच मुंह लगाए हुए दूसरी "प्रेमिका" का फोन सुनता है और बीच में ही उठ कर उसकी "सेवा" में चला जाता है; एक हीरो बड़ी सहजता से यह डायलॉग चिल्लाता है कि "ये शादी इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि इसने मेरा चूसा है और मैने भी इसकी ली है..."। ("मैंने भी इसकी ली है... " की जगह वास्तव में क्या है, इसे समझना मुश्किल नहीं है; वही हीरो अपनी "प्रेमिका" को दर्जनों बार "चुड़ैल-चुड़ैल" कहता है; और एक (आधुनिक और "इम्पावर्ड") हीरोइन को महज यौन-ताजगी के लिए अपने "प्रेमी" के साथ फूहड़ हो जाने की हद तक "जहां-तहां" मुंह में मुंह लगा कर मग्न हो जाने में कोई परेशानी नहीं होती...।

इसके अलावा, "देल्ही बेली" की कहानी क्या है, और इसके उपर्युक्त दृश्यों की जरूरत क्या थी, उसका जवाब नहीं मिलता है। अब इसे अगर कुछ "महान" समीक्षक स्त्री के पक्ष में खड़ी फिल्म तक घोषित करते हैं तो उनकी कुंठाओं या नफे-नुकसान का सिरा भी समझा जा सकता है।

बहरहाल, आमिर खान और अक्षत वर्मा को "पान सिंह तोमर" बनाना होता तो यह फिल्म कैसी बनती?

गांव का पान सिंह तोमर, फौजी पान सिंह तोमर, फौजी अधिकारियों से सजा पाता और उनसे पूरे भोलेपन के साथ जवाब-तलब करता पान सिंह तोमर, अपने दबंग और सामंती ठसक वाले रिश्तेदारों के अत्याचार झेलता पान सिंह तोमर, बागी पान सिंह तोमर, अपने गिरोह के साथ बीहड़ में जीता-मरता या धनपतियों का अपहरण करता और उनसे फिरौती वसूलता पान सिंह तोमर... । यानी अक्षत वर्मा और आमिर खान या अनुराग कश्यप जैसों के हिसाब से देखें तो पूरी फिल्म में संवाद या डायलॉग के नाम पर अगर कुछ होता तो बस मां-बहन की गालियां होतीं। शुरू से लेकर आखिर तक इस फिल्म में जो सामंती सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश मौजूद है, अक्षत वर्मा, आमिर खान, सुधीर मिश्रा या अनुराग कश्यप जैसे तमाम "महान" फिल्मकार इस फिल्म को गालियों की "गंगा" में डुबा देते और यह फिल्म भी समाज और संस्कृति के यथार्थ निरूपण का तमगा हासिल कर लेती!

लेकिन वे कौन-सी वजहें होंगी कि तिग्मांशु धूलिया को पूरी फिल्म में न केवल गाली जरूरी नहीं लगी, बल्किल एक जगह तिग्मांशु गालियों के खिलाफ खड़े होते हैं, जब पूरी फिल्म में एकमात्र जगह गाली का जवाब पान सिंह तोमर से दिलवाते हैं कि "हमारे यहां गाली पर गोली चल जाती है...।"

यह मेरे लिए हैरान कर देने वाली हकीकत है कि "पान सिंह तोमर" के पूरे परिवेश में अगर गालियां भर दी जातीं, तब भी उसे एक पैमाने पर जरूरी (सही नहीं) ठहराया जा सकता था, लेकिन तिग्मांशु धूलिया को पूरी फिल्म में यह गैर जरूरी लगा और इसके बावजूद फिल्म का एक मिनट का भी कोई दृश्य अपने असर में कमजोर नहीं रहा और दर्शकों में गहरे पैठा रहा।

मैं नहीं जानता कि तिग्मांशु की बाकी फिल्मों की सामाजिकता कैसी है, या आगे की फिल्मों में कैसी होगी। लेकिन मुझे लगता है कि "पान सिंह तोमर" के जरिए उस फिल्मकार के बारे में बात होनी चाहिए कि अगर वह ईमानदार है, जवाबदेह है, उसे अपनी क्षमता पर भरोसा है, उसमें कहीं सरोकार बचा हुआ है, वह खालिस दुकानदार नहीं हो गया है या वह व्यवस्था का एक एजेंट नहीं है तो वह विषय भी ढूंढ़ लेगा, कलाकार भी खोज लेगा और "पान सिंह तोमर" जैसी फिल्म भी बना लेगा, जो न केवल कहानी और प्रस्तुति के स्तर पर एक स्थायी असर से लबरेज होगी, बल्कि कारोबार के स्तर पर भी निराश नहीं होने देगी। (इस फिल्म ने साबित किया है कि वे फिल्मकार झूठ बोलते हैं जो यह कहते हैं कि दर्शक जो पसंद करता है, हम वही दिखाते हैं।)

दरअसल, हाल की कुछ फिल्मों में "यथार्थ का स्पर्श" देने के नाम पर जिस तरह गालियों से लैस संवादों को सहज स्वीकार्य बनाने की कोशिश की जा रही है, वह "यथार्थ" के निरूपण के नाम पर एक साजिश से ज्यादा कुछ भी नहीं। समाज में जहां-तहां पसरी यौन-कुंठाओं का शोषण करके मकसद भले ज्यादा-से-ज्यादा कमाई करना हो, लेकिन इस रास्ते होता यह है कि एक सामंती, मर्दवादी, पितृसत्तात्मक और भारतीय सामाजिक संदर्भों में ब्राह्मणवादी सत्ता की कुर्सी के पाए और मजबूत होते हैं। स्त्रियों और शूद्र जातियों के खिलाफ जलील करने वाली भाषा या गालियों का सहज इस्तेमाल दरअसल इस सत्ता को बनाए रखने के अहम औजार हैं। गालियों को सहज सामाजिक अभिव्यक्ति मानने वाले या तो खुद एक साजिश के सूत्रधार होते हैं या फिर शायद अंदाजा भी नहीं लगा पाते कि ऐसी भाषा का सुनने या बोलने के स्तर पर इस्तेमाल करते हुए वे किस बारीक साजिश का एक हिस्सा हैं या फिर शिकार हैं।

सच तो यह है कि गालियों के जरिए एक ऐसा समाज मनोविज्ञान और ऐसी राजनीति का जाल बनाया गया है, जो आखिरकार जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर सत्ताधारी, शासक और शोषक वर्गों का हित इस रूप में साधता है कि इससे सामाजिक हैसियत का मनोविज्ञान ज्यों-का-त्यों बना रहता है। यानी इस रास्ते शासित वर्गों को अपमानित करके उसका मनोबल गिराए रखना और उस पर मानसिक नियंत्रण बनाए रखना शासन का सबसे ताकतवर औजार बना। इसमें एक तरफ स्त्री की देह को ही उसकी अस्मिता का पर्याय बना दिया गया तो दूसरी ओर समाज के कमजोर तबकों की सामाजिक हैसियत, यानी वर्णक्रम पर आधारित जाति-व्यवस्था में नीची कही जाने वाली जाति की पहचान। यहां स्त्री के यौन की उनकी इज्जत का दूसरा नाम और उसे अपने नियंत्रण में रखने के लिए उसके यौन के खिलाफ शारीरिक या शाब्दिक हमला-हिंसा सामाजिक सत्ताओं का मूल चरित्र इसलिए बना, क्योंकि इससे एक साथ शूद्र जातियों और स्त्रियों- दोनों पर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और राजनीतिक नियंत्रण रखने में सबसे ज्यादा मदद मिली।

जाहिर है, ऐसे मनोवैज्ञानिक ढांचे-सांचे में जीते-मरते समाज की कुंठाओं का शोषण वैसी ही नई कुंठाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन के जरिए करना सबसे आसान है। और आमिर खान या सुधीर मिश्रा जैसे तमाम फिल्मकारों का मकसद केवल इन कुंठाओं का शोषण करके कुबेर बनना भर नहीं है, बल्कि उस साजिश को कामयाब बनाना भी है, जिसमें यह सामंती, मर्दवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था कायम रहे।

भदेसपन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होने की दलील देकर जो लोग गालियों का बचाव करते हैं या उन्हें महिमामंडित करते हैं, वे भी दरअसल अनजाने में या फिर जान-बूझ कर इस साजिश का हिस्सा बनते हैं। दलील भले ही जनतांत्रिक होने और लोकभाषाओं के प्रति सहनशील होने की हो...।

Friday 23 December 2011

उन्माद के उत्सव में गुम सवाल





इस विश्वकप के शुरू होने के ठीक पहले राष्ट्रीय अखबार ‘हिंदुस्तान’ के पटना संस्करण ने विश्वकप को समर्पित आठ पन्ने का एक विशेष परिशिष्ट निकाला, जिसके पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में मुख्य शीर्षक था- ‘वनडे मातरम्...।’ इसी तरह ‘आईपीएल-4’ के प्रचार के लिए एक विज्ञापन में जुमला उछाला गया- ‘पूरा भारत बंद रहेगा...’

आम जन में किसी नारे के प्रति व्याप्त धारणाओं के शोषण का क्या इससे भी बेहतर उदाहरण मिल सकता है? ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रवादी समूह बतौर हथियार लोगों को देश के नाम पर भावुक बनाने के लिए करते हैं। ‘भारत बंद रहेगा’ का आह्वान अब तक राजनीतिक आंदोलनों और सत्ता का विरोध जताने के लिए दिया जाता रहा है। लेकिन ‘वंदे मातरम्’ अब ‘वनडे मातरम’ के रूप में क्रिकेट के दीवानों जुमला बनेगा और ‘पूरा भारत बंद रहेगा’ का आह्वान अब आईपीएल प्रतियोगिताओं जैसी अय्याशियों पर मुग्ध होने के लिए किया जाएगा। न इस पर राष्ट्रवादियों को कोई आपत्ति है, न देश में क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलनों का आह्वान करने वालों को।

जागने की कोशिश में लगे लोगों के सामने नींद को इसी तरह एक सुहानी खुराक के रूप में परोसा जाता है।

कोई भी राजसत्ता यह बहुत अच्छी तरह जानती है कि उसकी राहों के सबसे बड़े रोड़े उसके शासन क्षेत्र की युवा शक्ति है। इसलिए वह उसकी लगाम थामने की हर कवायद करती है। यहां तानाशाही की चर्चा बेमानी होगी- दमन के तमाम रास्तों को जायज ठहराने के लिए लोकतंत्र को बचाने का तर्क दिया जाता है। और चूंकि किसी भी देश-काल में सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवा है, इसलिए दमन से लेकर दिशाहीन कर देने की सभी साजिशों का निशाना और शिकार वही होता है।

भारतीय राजनीति के पिछले लगभग दो दशक इस बात के गवाह रहे हैं कि समाज के इस सबसे ऊर्जावान वर्ग की क्षमता को कैसे कुंद किया जाता है, उसे दिशाहीन कर दिया जाता है या उसका इस्तेमाल रचना के बजाय विध्वंस के लिए किया जा सकता है। समाज के सारे सरोकारों से काट कर बाजार का खिलाड़ी बना देने या आधुनिकता के खोल के नीचे तमाम संकीर्णताओं को उनके रगों में घोल देने के लिए हमारी सामाजिक-राजनीतिक सत्ता-व्यवस्था ने कौन-कौन-से जतन किए हैं और उसमें उसे कितनी कामयाबी मिली है, यह कोई छिपी बात नहीं है। यहां युवाओं के सामने जो सपने परोसे जा रहे हैं वे दरअसल आत्मकेंद्रित जीवन के फार्मूलों की बुनियाद पर खड़े हैं। वहां खुद से बाहर की दुनिया बस इतनी है कि अपने वर्गीय ढांचे और दायरे में मौज-मस्ती के सिवा कुछ भी सोचना वक्त बर्बाद करने जैसा लगता है। सुख-सुविधाओं के तमाम आधुनिकतम संसाधनों और आधुनिक कहे जाने के सभी हथकंडों के सहारे जीते इन युवाओं के राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर जो खयाल सुनने को मिलते हैं, वह एक जागरूक, सभ्य और प्रगतिशील समाज के लिए किसी शर्म से कम नहीं है।

पप्पू बनोगे क्या...

सबको याद होगा कि 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान मीडिया में चुनाव आयोग की ओर से उछाला गया एक जुमला- ‘पप्पू बनोगे क्या...’ काफी चर्चित रहा था। उस ‘पप्पू’ का अर्थ क्या है और राजनीति या वोट देने में अरुचि दिखाने वाले युवाओं को ‘पप्पू’ बना देने की स्थितियां किसने रची है?

जिन लोगों ने गांवों और चुनावों के दौरान वहां की आबो-हवा को देखा होगा, वे बहुत बेहतर जानते होंगे कि चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं लेने वाले ये ‘पप्पू...’ दरअसल शहरों और महानगरों के पॉश इलाकों में ही पाए जाते हैं। गांवों के ‘बेकार’ युवाओं को उनके हालात पोलिंग बूथों तक खींच ले जाते हैं, आग्रह चाहे जो हों। हालांकि अब भी यह एक तल्ख हकीकत है कि एक बड़े वर्ग को पोलिंग बूथों तक पहुंचने की इजाजत नहीं है, उन्हें रोकने वाले चाहे जो हों। बीबीसी हिंदी या रेडियो पर आने वाले समाचारों के अलावा आसपास के दो-चार किलोमीटर के दायरे में किसी तरह पहुंच कर घूमने वाले अखबारों की खबरों से अपनी राजनीति करने वालों के लिए टीवी के रूप में मीडिया एक ऐसा औजार था जो आग्रहों को खुरच सकता था, परतें उघाड़ कर नई चमड़ी की जमीन तैयार कर सकता था।

लेकिन यह इस मीडिया के अध्ययनकर्ता बेहतर बताएंगे कि दो दशक के भीतर-भीतर कैसे इसने किसी को नींद से जगाने के बजाए एक ऐसे नशे में डुबा देने के बेहतरीन औजार का शक्ल अख्तियार कर लिया है, जिसमें किसी समस्या पर सोचना-समझना वक्त जाया करना माना जाता है। अब देखना है तो शर्मिंदा कर देने वाली या भीतर तक हिला देने वाली खबरों को बतौर सनसनी स्तब्ध होकर देखिए, किसी धारावाहिक में पांच मिनट की कहानी को पांच दिन में पसार दिए जाने की कलाकारी को मुग्ध भाव से देखते रहिए और ‘बिग बॉस’ टाइप बेहूदा और फर्जी रियलिटी शो देखते हुए उसके हर ‘बीप-बीप’ पर अपनी यौन कुंठाओं और लिप्साओं की तुष्टि का सुख लीजिए और इंतजार कीजिए कि अब किस महिला-पात्र को बाथरूम में नहाते या ‘वेसलिन’ लगाते हुए दिखाया जाएगा।

जादुई सुर का सहारा...

पारिवारिक और निहायत निजी दुनिया तो तय हो गई। लेकिन इसके बाद भी तो वक्त बच जाता है! संभव है कि खाली वक्त में दिमाग कुछ दूसरे ही तरीके से काम करना शुरू कर दे और विचारों के अपहरण के इस साजिश का पर्दाफाश हो जाए। इसलिए जो कुछ जज़्ब हुआ है, उसे खाली करने का भी इंतजाम होना चाहिए। क्रिकेट को एक ऐसे ही उन्माद के उत्सव के रूप में पेश किया गया है, जिसकी मार्फत अपने विचारों के अपहरण में व्यक्ति उन चूहों की तरह खुद शामिल होता है जो जादुई सुर में बैगपाइपर बजाने वाले एक अजीब-सी वेशभूषा वाले आदमी के पीछे चल पड़े थे। फर्क यह है कि अजीब-सा वह आदमी बदला लेने के लिए भी उसी तरह के दूसरे जादुई सुर का सहारा लेता है और उस शहर के सभी बच्चों को अपने पीछे खींच ले जाता है और यहां सवाल बदले का नहीं है। यहां सुबह की उम्मीद में जागने के लिए कुनमुनाते समाज के सामने फिर से गहरा अंधेरा पसार देने की साजिश है।




कुछ समय पहले एक सर्वेक्षण में यह बताया गया था कि अब क्रिकेट विश्वकप शुरू होने के बाद एक बार फिर कैसे और कितने लोग मैच देखने के लिए टीवी में घुस जाएंगे या मैदान का रुख करेंगे और इससे कितने काम के घंटे बर्बाद होंगे और अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान होगा। लेकिन इस तरह के सर्वेक्षण करने वालों को इस मायने में पिछड़ा कहा जाएगा कि ये लोग अब भी क्रिकेट के कारण होने वाली आर्थिक क्षति की बात करते हैं। अगर अर्थव्यवस्था के पैमाने पर ही बात करना है तो सिर्फ इस पहलू पर गौर कर लिया जाए कि क्रिकेट आज कितना खेल रह गया है और कितना बाजार, तो उसके नुकसानों के आकलन के परिप्रेक्ष्य बदल जाएंगे। यह कहने के लिए शायद अब कोई तर्क देने की जरूरत नहीं रह गई है कि क्रिकेट अब मैदान में नहीं, टीवी के पर्दों पर खेला जाता है और इस देश में क्रिकेट अब कोई खेल नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से एक बिजनेस है। एक आकलन के मुताबिक भारत में विज्ञापन का सालाना बाजार तीस हजार करोड़ रुपए का है। इसमें टीवी विज्ञापनों का व्यवसाय बारह सौ करोड़ रुपए है, जिसमें सिर्फ इस विश्वकप और उसके तुरंत बाद होने वाले आईपीएल- 4 में दो हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। दुनिया भर में क्रिकेट में जितनी कमाई होती है, उसका सत्तर फीसदी अकेले भारत से जाता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में टीवी मीडिया के लिए क्रिकेट आज सबसे प्यारा खेल क्यों हो गया है। टीवी पर क्रिकेट का जितना कोई मैच चल रहा होता है, उससे ज्यादा विज्ञापन छाया रहता है। खिलाड़ियों के बैट, विकेट, जूते, ड्रेस हो या पूरी बाउंड्री लाइन से लेकर मैदान के अंदर-बाहर लगे होर्डिंग्स- सब के सब प्रायोजित होते हैं। इस विश्वकप के मैचों के दौरान दस सेकेंड के एक विज्ञापन के प्रसारण की कीमत साढ़े तीन लाख रुपए है। आईपीएल- 4 में इसी अवधि, यानी दस सेकेंड के विज्ञापन की दर पांच लाख रुपए है। एक आकलन के मुताबिक इस विश्वकप के खत्म होने के बाद लगभग हर भारतीय खिलाड़ी के हाथ में कम से कम पांच करोड़ रुपए होंगे। भेड़ या बकरियों की तरह खिलाड़ियों को खरीदने से लेकर हर मैच में हर चौके या छक्के तक के प्रायोजित होने के बावजूद अगर क्रिकेट को किसी खेल के रूप में देखा जा रहा है तो यह इसी देश में मुमकिन है।

पेप्सी कोला बेचो, भारत रत्न पाओ...

इसके अलावा, जो कंपनियां अरबों रुपए खर्च करके प्रसारण का अधिकार खरीदती हैं, वे जनता की सेवा या क्रिकेट का कल्याण करने के लिए ऐसा नहीं करती हैं। जाहिर है, अरबों रुपए खर्च करने का जोखिम उससे कई गुना मुनाफा कूटने की मकसद से ही होता है। लेकिन सब कामधाम छोड़ कर टीवी में आंखें गड़ाए सचिन तेंदुलकर जैसे अपने सभी महान खिलाड़ियों को बल्ला भांजने से ज्यादा पेप्सी या कोकाकाला बेचते हुए देखने वाला एक आम दर्शक कहां इस हिसाब में जाता है! अगर किन्ही हालात में इस तरह के हिसाब लगाने भी लगे, तो इसके पीछे उसके दिमाग को कुंद करने की साजिशों तक पहुंचना क्या इतना आसान है, जो एक महान खेल क्रिकेट और राष्ट्रवाद के उन्माद के छौंक से ढका रहता है।




अगर किसी को लगता है कि ये तमाम इंतजाम क्रिकेट के किसी मैदान में आए दर्शकों को लुभाने के लिए है, तो वह भरम में है। आज का क्रिकेट दरअसल पूरी तरह टीवी दर्शकों पर निर्भर हो चुका है और उन्हीं के लिए खेला जाता है। स्टेडियम में मौजूद दर्शक भी सिर्फ एक ऐसे टीवी शो के दर्शक की भूमिका में होते हैं, जो घरों या दुकानों में टीवी के सामने बैठे लोगों की उत्तेजना को बनाए रखने के काम आता है।

कभी कलात्मकता और बारीक प्रयोगों के लिए मशहूर इस खेल खिलाड़ी कब ‘ग्लैडिएटर’ बन कर ‘जान दे दो या ले लो’ की शैली में सिर्फ बल्ला भांजने को मजबूर हो गए, खिलाड़ियों की करोड़ों-अरबों के लहराते नोटों से होती नीलामी और खरीद-बिक्री के बीच क्या किसी को पता भी चला? यहां आकर तो लगता है कि बाजार के इन महीन खिलाड़ियों को इस बात की गहरी परख है कि भारतीय जनमानस युद्ध के खयालों को लेकर कितना रूमानी रहा है और इसी रूमानीपन का ज्यादा से ज्यादा शोषण करने के लिए उन्होंने क्रिकेट को ग्लैडिएटरों का खेल बना दिया। टेस्ट मैच से एकदिनी, इसके बाद रात-दिनी और अब बीसम-बीसम। उत्तेजना को बनाए रखने के लिए और उसमें इजाफा करने के लिए समय की अवधि को छोटा करना अनिवार्य है। इस खेलने वाले बहादुर और इसे देखने बहादुर! और बहादुरी का ठेका चूंकि मर्दानगी या मर्द की छवि के बंधा है, इसलिए मर्दानगी के भाव की तुष्टि के इंतजाम के लिए चीयर लीडर्स...! हर चौके या छक्के पर अधनंगी चीयर लीडरों के ठुमके जितने अश्लील नहीं लगते, उससे ज्यादा अश्लील वह क्रिकेट लगने लगता है जिसमें ग्लैमर भरने के लिए कुछ स्त्रियों के शरीर की नुमाइश लगाई जाती है।


उत्तेजना और रफ्तार का जलजला...

इसी तरह इस पर सोचना भी किसी को जरूरी नहीं लगता है कि कभी सिर्फ अंग्रेज भद्रजनों तक सीमित रहने वाला यह खेल पिछली सदी के आखिरी दो दशकों में कई उदाहरणों से इस उम्मीद को पुख्ता करने लगा था कि अब इसमें गरीब मुल्कों के मेहनती और पेशेवर खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकेंगे, वही क्रिकेट अब कैसे इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के साथ-साथ लगभग पूरी तरह पूंजीपतियों का तमाशा बन चुका है जो खासतौर पर टीवी मीडिया के जरिए देश-दुनिया के सामने परोसा जा रहा है। उत्तेजना और रफ्तार में वैसे लोगों का खारिज़ होना तय है जो इसके लिए सामाजिक तौर पर ‘तैयार’ नहीं हैं।

तो ‘बिग बॉस’ जैसे फर्जी रियलिटी शो और लगभग बेवकूफ बनाए रखने के मकसद से पेश किए जा रहे धारावाहिकों के अलावा क्रिकेट के उन्माद में लोगों को फंसाए रखना- यही इस क्रांतिकारी मीडिया की रोजाना की व्यस्तताएं हैं, जिसके शुरुआती दौर में धोखे में कुछ लोगों ने मान लिया था कि शायद यह समाज का चेहरा बदल दे। लेकिन हम एक ऐसे समाज के हिस्से हैं, जिसकी जादुई सत्ता हर नए समाज का सिंहासन हासिल करने के लिए सबसे उपयुक्त पात्र के रूप में अवतार ले लेती है। बल्कि यों कहें कि इसे किसी भी जलजले का अंदाजा लगाना खूब आता है और यह खुद से ऊबे हुए समाज के बरक्स तुरंत ऐसा समाज गढ़ लेता है, जहां उसके सिंहासन की जगह पहले तैयार की जाती है।

एक विरोधहीन समाज तैयार करना यों भी किसी सत्ता का मुख्य मकसद होता है। इसलिए वह सबसे पहले किसी भी समाज में विरोध की रीढ़ को कमजोर करता है। यानी उसकी समूची युवा पीढ़ी को एक लुभावने ‘इंद्रजाल’ में ऐसे उलझा देता है कि किसी भी व्यापक संदर्भों वाले मसले पर विचार करने को वह बेकार में सिर खपाना मानता है और टीवी कार्यक्रमों और विज्ञापनों में पेश दुनिया के ख्वाब उसके अपने होते हैं। और यह शायद दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के जीवन-लक्ष्यों के साथ जीने वाले किसी भी शख्स के लिए आगे निकलना महत्त्वपूर्ण होता है, चाहे उसके लिए खुद का या सामने पड़ने वाली किसी भी बाधा का दमन क्यों न करना पड़े।

आगे... और आगे... तेज... और तेज...

आगे निकलना यों एक सकारात्मक विचार होना चाहिए। लेकिन क्या यह विचार इसी रूप में देखे-समझे जा सकने लायक स्थितियों में रह गया है? नवउदारवादी पूंजीवाद के इस विकट दौर में शायद सबसे ज्यादा संकट शब्दों की परिभाषाओं के सामने ही खड़ा हुआ है। जड़ताओं को पीछे छोड़ आगे निकलने का मतलब यह है कि आपने बाजार में आने वाली किस नई कार को अगले हफ्ते खरीदने का मन बना लिया है। सबसे महंगे इलाके के सबसे महंगे फ्लैट में सबसे आधुनिक सुख-सुविधाओं का भोग करते हुए अगर जाति पर गर्व करता या अपने विवाह के लिए दहेज की रकम तय करने में मुख्य भूमिका निभाता कोई युवा मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं करने की जरूरत है। देश की संस्कृति या शिक्षा व्यवस्था ने उसे दिया क्या है कि वह ब्राह्मण, ठाकुर, यादव किसी दलित-आदिवासी चेतना से मुक्ति पा सके या डॉक्टरी-इंजीनियरी या आईएएस-आईपीएस का तमगा लटकाने के बावजूद शादी के नाम पर अपनी कीमत लगाने से पहले शर्म से मर जाए…!

आधुनिकता का लबादा ओढ़े वे युवा किस जमीन पर खड़े होते हैं, जिनके लिए पहले वर्ग, फिर अपनी जाति प्यारी हो जाती है? स्त्री या दलित जिनके लिए महज मनोरंजक प्रश्न हैं। वे कौन-से कारण हो सकते हैं कि किसी शैक्षिक संस्थान में दलितों या कमजोर तबके के छात्रों के लिए घोर अपमानजनक और पीड़ादायक स्थितियों की ‘रचना’ की जाती है और पीड़ितों की चीख के साथ उनके संगी-साथी तक खड़ा नहीं हो पाते? अगर कभी इक्के-दुक्के विद्रोह का झंडा उठा भी लें तो सत्ता उन्हें किसी भी कीमत पर खरीद लेना चाहती है। अगर यह नहीं हो सका तो अनुशासन के नाम पर दमन का हथियार उसके पास है। यानी या तो अपने ‘विकास’ की अंधी दौड़ में शामिल हो जाएं और अपने आसपास देखना बंद कर दें, या फिर उस सत्ता की चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार रहें जिसके पास आपको खत्म कर देने के तमाम रास्ते और ‘हरबे-हथियार’ मौजूद हैं।

बदलाव का सुनहरा इंद्रजाल...

दरअसल, हम जिस सत्ता की बात करते हैं, वह चाहती ही यही है कि बदलाव का विचार महज अपनी और केवल आर्थिक उन्नति के दायरे में कैद रहे। इससे समाज के ढांचे को भी ज्यों का त्यों बनाए रखने में मदद मिलती है। इसलिए वह पहले अपनी सारी कारगुजारियों के स्वीकार के लिए समाज के सामने उसके कल्याण का तर्क पेश करती है। फिर अपनी बर्बरताओं को भी सभ्य समाज के लिए अनिवार्य घोषित कर देती है। यह पूरा का पूरा मनोविज्ञान का खेल होता है, जिसमें मुख्य निशाना समाज का युवा वर्ग ही होता है। ‘चेंज’ या बदलाव का अर्थ कभी समाज को बदल डालने में लगाया जाता रहा होगा। आज के युवाओं के लिए उस अर्थ में यह एक रूमानी खयाल से ज्यादा कुछ नहीं है। अब ‘चेंज’ का मतलब बाजार की मांग के अनुकूल आचरण करना और उसके रंग में रंग जाना है। अगर इसमें पिछड़े तो चेतना के स्तर पर पिछड़े होने का लांछन ढोने के लिए तैयार रहना होगा। ऐसे ही लोगों का ही समाज तैयार करने की कोशिश की जा रही है जिनकी दुनिया टीवी या मीडिया के जरिए परोसे जा रहे फर्जीवाड़े तक ही सिमटी रहे। आपसी बातचीत के लिए कोई ‘बिग बॉस’ टाइप बेहूदा टीवी सीरियल है, या फिर क्रिकेट। बहुत धीरे-धीरे और चुपके से विचारों की रचना-प्रक्रिया पूरी तरह बाजार के हवाले की जा रही है। कोई भी दावा नहीं कर सकता कि समाज के वंचित वर्गों के लिए स्थितियों में सौ साल पहले के मुकाबले कोई बड़ा और बुनियादी बदलाव आया है। लेकिन राजनीति का खेल खेलने वालों ने ‘विकास’ और बदलाव का ऐसा इंद्रजाल रचा है कि एक जड़ व्यवस्था के मुकाबले एक जटिल व्यवस्था की साजिशें हमें दिखाई नहीं देतीं। जातीय सड़ांधों और वर्गीय पूर्वाग्रहों से लैस इस आधुनिकता की परतें इतनी मोटी और परिष्कृत हैं कि यहां से अतीत तो स्वर्ण युग लगता ही है, भविष्य भी केवल सुनहरा दिखता है। बस वर्तमान शून्य और अस्मिताविहीन है...!

(कथादेश के मीडिया विशेषांक में)

Wednesday 19 October 2011

तर्क के खिलाफ आस्था का हथियार...



दिल्ली
विश्वविद्यालय में राम कथा
पर आधारित "तीन सौ रामायण- पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार" नामक किताब को लेकर फिर से गर्मी छाई हुई है। इस संदर्भ में तीन साल पहले भी हंगामा हुआ था। तब मैंने "जनसत्ता" में यह लेख लिखा था। शायद एक बार फिर यह प्रासंगिक हो...




कहते हैं किसी एक झूठ को बार-बार रटने से या तो वह सच के वहम में तब्दील हो जाता है, या फिर प्रहसन बन जाता है। तो राम भरोसे राजनीति की नाव पर सवार हिंदू कट्टरपंथी समूहों की पीड़ा समझना बहुत मुश्किल नहीं है। बाबरी मस्जिद के बाद राम मंदिर का मुद्दा लगभग पिट चुका है, सो कुछ महीने पहले अचानक ही रामसेतु की राह दिखाई पड़ गई थी। मगर पहले-सी उत्तेजना पैदा कर सकने में कामयाबी नहीं मिली। अब दिल्ली विश्वविद्यालय की एक किताब में फिर से "मुश्किल" में पड़े राम को खोज निकाला गया है और उनके "उद्धार" का अभियान शुरू हो गया है।

पिछले दो साल से यह किताब दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक इतिहास के ऑनर्स पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है। इसमें "प्राचीन भारत में संस्कृति" के तहत "तीन सौ रामायण- पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार" शीर्षक से एक अध्याय शामिल है, जिसके लेखर एके रामानुजन हैं। रामानुजन दक्षिण भारत के प्रसिद्ध लोककथाओं के विद्वान, भाषाविद, कवि और अनुवादक थे। उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया के अध्ययन कार्यक्रम तैयार करने में काफी अहम अहम भूमिका निभाई। इस लेख में उन्होंने राम के बारे में दुनिया भर में प्रचलित अलग-अलग कहानियों का जिक्र किया है। राम को भारतीय धर्मग्रंथों में एक सबसे ज्यादा लोकप्रिय देवता के रूप में माना जाता रहा है। लेकिन समय के साथ विभिन्न मतों में रामकथा की अलग-अलग तरीके से व्याख्या भी की गई। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विषय से स्नातक ऑनर्स के पाठ्यक्रम में शामिल इस पाठ का मकसद सिर्फ इतना है कि छात्रों को आम हिंदू समाज में पाई जाने वाली पारंपरिक अवधारणा से इतर तमिल, बौद्ध, जैन या कुछ दूसरे मतों में प्रचलित कहानियों के अध्ययन और उनके विश्लेषण का मौका मिले। फिर पाठ्यक्रम में इसे पूरी तरह वैकल्पिक रखा गया है और इसे पढ़ना या नहीं पढ़ना अपनी मर्जी पर निर्भर है। इसे ही सही मान लेने का आग्रह कहीं नहीं है।

लेकिन इस मसले पर दिल्ली विश्वविद्यालय में जो हुआ, उससे यह लगता है कि अब शैक्षणिक संस्थानों को भी "हिंदुत्व की प्रयोगशाला" बनाने की मुहिम शुरू हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के गर्भनाल से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कथित नेताओं ने इस बात का भी लिहाज करना जरूरी नहीं समझा कि वे विश्वविद्यालय परिसर में हैं। लेकिन जब पहले से यह तय हो कि बात करना उतना जरूरी नहीं, जितना उत्पात मचाना, तो उचित-अनुचित जैसे सवाल गैरजरूरी मान लिए जाते हैं। किताब में रामकथा पर आधारित उस अध्याय का विरोध करने के लिए इतिहास विभाग में तोड़फोड़, शिक्षकों को अपमानित करने और उनके साथ मारपीट का दृश्य किसी दंगे के पूर्वाभ्यास से कम नहीं था। ध्यान रहे कि इस मसले पर भाजपा के एक पूर्व सांसद रामविलास वेदांती तालिबानी अंदाज बिखेरते हुए पाठ्यक्रम में रामानुजन का पाठ शामिल करने के लिए जिम्मेदार कुलपति का सिर काट कर लाने वाले को ईनाम देने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। सवाल है कि क्या इसी तरह की "सहिष्णुता" के दम पर हिंदुत्व की गौरवगाथा लिखने की तैयारी की जा रही है?

भाजपा के इस छात्र संगठन के नेताओं ने इतिहास विभागाध्यक्ष एजेडएच जाफरी के साथ जिस तरह का बर्ताव किया और मारपीट की, वह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या, पुणे के भंडारकर शोध संस्थान में उत्पात और बड़ौदा विश्वविद्यालरय में वहां के संकाय प्रमुख और छात्रों के साथ मारपीट जैसी "बहादुरी" इसके और इस जैसे कुछ दूसरे संगठनों के चरित्र की मुख्य विशेषता बन चुकी है। उलटबांसी यह कि भारतीय संस्कृति और महान गुरु-शिष्य परंपरा की दुहाई देने के काम में इन्हें कभी थकते नहीं देखा गया।


विडंबना यह है कि एक उदार और लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा होने के बावजूद इस तरह के संगठन से जुड़े लोग अपनी आस्थाओं की अभिव्यक्ति के लिए कोई भी रास्ता अख्तियार करने को तैयार रहते हैं। लेकिन खुद से सहमति नहीं रखने वालों की अभिव्यक्ति इन्हें परेशान करती है। इस बात पर तो तरस ही खाई जा सकती है कि कोई यह मान ले कि दुनिया उसकी इच्छाओं या आस्थाओं का खयाल रखे, भले ही वह प्रताड़ित करने की हद तक दूसरों की इच्छाओं का अतिक्रमण करे। अभिव्यक्ति की आजादी का यह हनन किसी फिल्म के प्रदर्शन का विरोध करने से लेकर किसी किताब पर पाबंदी लगाने की मांग के लिए भी हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने के रूप में सामने आ रहा है। मुश्किल यह है कि सरकारों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रह गया है कि विचार-विश्लेषण की प्रक्रिया को और मजबूत करने या वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के मसले पर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रतिक्रियावादी ताकतों का मुकाबला किया जाए। उलटे वे "हिंसा की आशंका" को आधार बना कर किसी फिल्म या किताब पर पाबंदी लगाने में देर नहीं लगातीं। दरअसल, इसके पीछे हिंसा की "आशंका" से ज्यादा फिक्र अपनी राजनीति की होती है।

जहां तक अलग-अलग रूप में प्रचलित रामकथा की जानकारी देने वाले पाठ पर पाबंदी की मांग का सवाल है तो उनका क्या जाए जो "रामचरितमानस" में शूद्रों और स्त्रियों को अधिकतम अपमानित किए जाने का आरोप लगाते हैं? यहां हमारी आस्था का वर्गीकरण क्यों हो जाता है? आस्था का झंडा लेकर देश को "आंदोलित" करने का बीड़ा उठाए लोगों को क्या कभी दलित उत्पीड़न के किसी मामले पर चिंतित होते देखा गया है? ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि इससे यथास्थिति भंग होगी और सामाजिक सत्ता का मौजूदा ढांचा बिखरेगा। और चूंकि आस्था इस ढांचे की सुरक्षा में सबसे कारगर हथियार साबित होती है, और इसका इस्तेमाल भी बेहद आसान है, इसलिए सबसे पहले इसी पर चोट पहुंचाए जाने का हौवा खड़ा किया जाता है। फिर इसके लिए किए जाने वाले हिंसक प्रदर्शन एक प्रत्यक्ष दबाव का काम करते हैं।


दरअसल, कट्टरता की बुनियाद पर खड़े किसी समूह के लिए लगातार किसी भावनात्मक मुद्दे की बैसाखी का सहारा एक मजबूरी होती है। आम हिंदू मानस में राम का देव-रूप गहरे तक पैठा है और हिंदुत्व के कथित पैरोकारों के लिए राम एक सहज और सुलभ मुद्दा हैं, इसलिए राम नाम के संकट का हौवा खड़ा कर उसे उकसाना भी उतना ही आसान है। इसकी संवेदनशीलता का अंदाजा इन हिंदूवादी समूहों को बखूबी है और यही वजह है कि राम नाम को बार-बार राजनीति के बाजार में खड़ा किया जाता है। वरना क्या कारण है कि सालों से विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की एख वैकल्पिक सामग्री अचानक इनके लिए इतनी अहम हो जाती है?

जो भी हो, अब एक औसत हिंदू भी राम के मुद्दे पर भाजपा-विहिप या दूसरे हिंदूवादी दलों का पाखंड समझ चुका है। राम मंदिर की गर्मी उतर जाना इसका सबूत तो है ही, सेतुसमुद्रम परियोजना में जिस तरह रामसेतु का सवाल घुसा कर लोगों में उन्माद पैदा करने की कोशिश नाकाम रही, उससे यही साबित होता है कि लोग अब इसे महज एक राजनीतिक चाल से ज्यादा अहमियत देने को तैयार नहीं हैं।

इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में उत्पात मचाने और दंगे जैसा माहौल पैदा करने के पीछे क्या वजह हो सकती है? दरअसल, तोड़फोड़, हमला या निराधार बातों पर ऊधम मचा कर समय-समय पर अपने वजूद का एहसास कराते रहना कट्टर या सांप्रदायिक संगठनों की मजबूरी होती है। मिसाल के तौर पर विहिप, शिवसेना और अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसे संगठन गाहे-बगाहे बिना बात के उत्पात मचाते रहते हैं, जिसका मकसद अपने अस्तित्व का एहसास कराते रहना भर है। आम जन के हितों के मुद्दे उनके लिए बेमानी होते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ऊधम को इसकी ताजा कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। यों भी, महाराष्ट्र में शिवाजी पर एक किताब के विरोध के सिलसिले में शिवसेना ने जो किया और उसमें उसे आखिरकार कामयाबी मिली, विद्यार्थी परिषद शायद उसी को नजीर मान कर चल रही है। इससे पहले भाजपा शिवाजी पर "आपत्तिजनक" टिप्पणियों को आधार बना कर जवाहरलाल नेहरू की किताब "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कर चुकी है। यह किताब हिंदी में भी उपलब्ध है और भारत के इतिहास के बारे में इसे एक प्रामाणिक और संदर्भ ग्रंथ के रूप में जाना जाता रहा है।

आमतौर पर ऐसे संगठन किसी विषय पर बहस के लिए तैयार नहीं होते। तथ्यों और तर्कों के साथ बात करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और इसमें इनकी सीमा किसी से छिपी नहीं है। इसलिए ये बार-बार भावनाओं और आस्था के आहत होने का सवाल उठाते हैं जो इनके लिए महज अपनी राजनीतिक दुकानदारी चमकाने का जरिया भर होते हैं। यहीं ये इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते कि जो इनसे सहमत नहीं हैं, उनकी भावनाओं का क्या जाए। इस तरह के सवाल उठने पर ये जो रवैया अख्तियार कर लेते हैं और ऐसे मसलों पर इन संगठनों का जो चरित्र रहा है, उसे देते हुए इनसे किसी मसले पर बहस की उम्मीद बेमानी ही है।

इतिहास पर आस्था को तरजीह देना इस लिहाज से इनके हित में है कि इतिहास की परतें खुलने पर बहुत सारी आस्थाएं एक झटके में खंडित हो जा सकती हैं। और भावनात्मक मुद्दे जिनके टिके रहने का एकमात्र सहारा हैं, वे इस पर विचार करना क्यों जरूरी समझेंगे? इनके लिए इतिहास इसलिए भी एक अप्रिय विषय है क्योंकि हिंदुत्व की जिस सहिष्णुता का ढिंढोरा पीटा जाता है, इतिहास के पन्ने उसकी कलई खोलने लगते हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना में अड़ंगा डालने के लिए जिस प्राकृतिक संरचना को वे समुद्र पार करने के लिए राम द्वारा बनवाया गया सेतु और इतिहास की एक सच्चाई सिद्ध करने पर तुले थे, उसके साथ-साथ रामायण के सारे विवरण को सच मानने का आग्रह इन्हें असहज कर देता है। इसी तरह महज जन्म के आधार पर नब्बे फीसद लोगों का किसी न किसी बहाने रोज-रोज जलील होना किस बारीक तरीके से नियति बना दी गई और उस यातना पर गर्व करने की घुट्टी पिला दी गई, अब उसकी व्याख्याएं सामने आने लगी हैं। यह निश्चित तौर पर "हिंदुत्व की प्रयोगशालाओं" की खोज में लगे रहने वालों के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा करती है और वहां इनके लिए आस्था एकमात्र महत्त्वपूर्ण चीज हो जाती है। जाहिर है, ध्यान बंटाने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाने और हिंसा या उत्पात का सहारा लेने को ये अपना मुख्य धर्म समझते हैं, जो इनकी सीमा भी है।


मुश्किल यह है कि मीडिया का एक हिस्सा भी इन मसलों पर जिस तरह गैरजिम्मेदारी से भरा रवैया अपनाता है, वह विमर्श या संवाद की संभावनाओं को खत्म करता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हमले से पहले टीवी चैनलों को बुला कर बाकायदा प्रायोजित तरीके से हिंसा की गई। यह उत्साह इस मुद्दे पर बातचीत करने के मामले में नहीं दिखाया गया। इस तरह की ज्यादातर खबरें या तो गैरजरूरी होती हैं, या इनकी रिपोर्टिंग में एक तटस्थ विश्लेषण के बजाय संबंधित व्यक्ति का आग्रह हावी रहता है। रामकथा से संबंधित ताजा विवाद में भी यह साफ-साफ देखा गया कि कैसे किसी मामले को जबर्दस्ती खबर बना कर उसे इस हद तक संवेदनशील बना दिया गया कि कट्टरपंथी और सांप्रदायिक गुटों को अपनी रोटी सेंकने का मौका मिल गया।


Friday 29 April 2011

बाबाओं में गुम दुनिया...

तो पनचानबे साल में मरने की घोषणा करने वाले भगवान सत्य साईं बाबा लगभग दस साल पहले मर गए। सत्य साईं बाबा को एक भगवान के रूप में पहचान दिलाने का श्रेय उनके उन "चमत्कारों" को जाता है जो अक्सर वे अपने भक्तों के सामने प्रदर्शित करते थे। हवा में हाथ हिला कर कभी सोने की अंगूठी तो कभी कोई मिठाई अपने भक्तों के हाथ में रख देने जैसे करतब ने लोगों को कहां-कहां से उनकी आंखें छीन लीं, यह साई बाबा बेहतर जानते हैं और इसके साथ हमारी यह सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था भी जानती है जो खुद को सत्ता के बनाए रखने के लिए इस तरह के चमत्कारों और अंधविश्वासों को ही अपना हथियार बनाती है। एक ऐसा संजाल रचती है, उसमें लोगों को उलझाती है, ताकि लोग खुद पर से भरोसा खो दें और ऐसे चमत्कारों में अपना उद्धार देखने लगें।

"मैजोकिज्म" मनोविज्ञान का एक टर्म है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने सामने किसी गुरु जैसी शख्सियत की हर बात के सामने सिर्फ सिर नवाता है, वह बात चाहे भली हो या कितनी भी वीभत्स हो। लेकिन इसका नतीजा यह होता है कि इस क्रम में स्वाभाविक प्रतिक्रिया की जो लहरें उसके भीतर ही उमड़ती-घुमड़ती जमा हुई रहती हैं, वे किसी कमजोर निशाने पर अपनी समूची विकृति के साथ फूटती है। इस नतीजे को "सैडिज्म" का नाम दिया गया है। यानी इस पूरी प्रक्रिया में हम अपने समाज और धर्म की पूरी व्यवस्था को देख सकते हैं, जिसमें इसकी बुनियाद में अंधविश्वास है। और इसी के शोषण की बुनियाद पर यह व्यवस्था हमारे सामने अट्टहास करती रहती है और हम उसके सामने सिर नवाए चुपचाप देखते और उसे सही मानते रहते हैं।

यह आलेख अक्टूबर-नवंबर, 2008 के जनसत्ता में छपा था। मैंने इस ब्लॉग पर भी डाला था। आज इसे फिर से नया करने की जरूरत लगी...




अंधविश्वास के अंधकार में...


"किसी को आत्मा के अमरत्व में विश्वास करने के लिए लगा दो और उसका सब कुछ लूट लो। वह हंसते हुए इस लूट में तुम्हारी मदद भी करेगा"- अप्टन सिनक्लेयर।


तंत्र-मंत्र और रूहानी इल्म के माहिर/ खुला चैलेंज/ लाभ 100 प्रतिशत/ 20 मिनट में गारंटी कार्ड के साथ/ जैसा चाहोगे, वैसा होगा/ माई प्रॉमिस/
नोट- अगर आपका विश्वास किसी ज्योतिष, पंडित-बाबा, मियां-मुल्ला, तांत्रिक से उठ गया हो तो एक बार अवश्य मिलें

मनचाहा वशीकरण स्पेशलिस्ट
कारोबार में रुकावट, बंदिश, गृह-क्लेश, मियां-बीवी के झगड़े, तलाक, दुश्मन और सौतन से छुटकारा, कर्ज मुक्ति, संतानहीनता, कोख बंधन, मुठकरनी, विदेश यात्रा, लव-मैरिज, फिल्मी और मॉडलिंग कैरियर में रुकावट जैसी जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान।
चेतावनीः मेरे किए को काटने वाले को 1,51,000 रुपए ईनाम।

सभी इल्मों की काट हमारे पास है।

-प्यार में चोट खाए स्त्री एवं पुरुष एक बार अवश्य मिलें।

-एक अगरबत्ती का पैकेट दो नींबू साथ लाएं।

रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह। वर्ल्ड फेमस

-सिद्ध गुरू अकबर भारती या समीरजी (बंगाली)


नगर सेवा की बसों, सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों जैसी जगहों पर चिपकाए गए 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज' की तरह के ऐसे विज्ञापनों पर एक 'पढ़े-लिखे' और 'सभ्य' व्यक्ति होने के नाते हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम मुंह बिचकाते हैं, ऐसा विज्ञापन करने वालों को ठग और मक्कार कहते हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को मूर्ख मानते हैं। अगर हम ऐसा विज्ञापन करने वाले ठगों और मक्कारों को अपराधी की तरह देखते हैं या उनके खिलाफ हमारे भीतर नफरत के भाव पैदा होते हैं तो शायद यह गलत नहीं है।

ऐसी राय रखने वाले हम सब आमतौर पर बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त, बहुत अच्छी और साफ-सुथरी जीवनशैली वाले, सूटेड-बूटेड टाईयुक्त कपड़े पहनने वाले और अपनी पहुंच के लगभग सभी आधुनिक उपकरणों-संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले होते हैं। वैसे विज्ञापनों पर ऐसे 'सभ्य, शिक्षित और विकसित' समाज का हिस्सा होने के नाते हमारी इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद हम अपनी 'सभ्यता' और 'सामाजिक ऊंचाई' में थोड़ा और इजाफा होता हुआ महसूस करते हैं।

और जब समूचे समाज और उसकी सभ्यता को 'दिशा' देने वाले मीडिया को भी हम कुछ इसी तरह का या इससे भी ज्यादा असरदार तरीके से ऐसा ही काम करते हुए देखते हैं, तब हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? जब हम टीवी पर सूटेड-बूटेड टाईयुक्त और 'सभ्यता की पराकाष्ठा' पर पहुंचे हुए लोगों को लगभग चिल्ला कर यह कहते हुए देखते-सुनते हैं कि 'प्रलय... अब धरती बस खत्म होने वाली है' तो हमारे भीतर कौन-से भाव पैदा होते हैं? उस वक्त क्या हमें सड़क के किनारे या पेशाबखानों की दीवारों पर चिपकाए हुए वे विज्ञापन याद आते हैं? क्या ऐसे विज्ञापन करने वालों की मक्कारी और 'समस्याओं से मुक्ति' के लिए उन जगहों पर जाने वाले लोगों की मूर्खता याद आती है?

शायद नहीं। गहरे सम्मोहन के उस दौर की गुलामी की बात ही निराली है। उदयपुर के राकेश और राजग़ढ़ की छाया ने जो किया, उसी सम्मोहन के उन्माद का चरम है, जिसमें झूमते हुए तो बहुत सारे लोगों को देखा जा सकता है, लेकिन 'अंत' से पहले खुद को खत्म कर लेना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। हां, 'जिंदा' रहते हुए मौत की चाहे जितनी पीड़ा वे झेल लें।

एक टीवी चैनल पर ज्योतिष संबंधी कार्यक्रम देखने के बाद राकेश ने एक कागज पर लिखा- 'कार्यक्रम को देख कर मुझे लगा कि मैं गलत ग्रह-नक्षत्र में पैदा हुआ हूं और इस वजह से मैं काफी परेशान हूं।' इसके बाद उदयपुर के बीएन कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष के उस छात्र ने गले में फंदा लगा कर जान दे दी। इसी तरह एक ओर 'बिग बैंग' की सच्चाई की खोज में विज्ञान अब तक के सबसे बड़े प्रयोग की तैयार कर रहा था और टीवी चैनल इस प्रयोग के साथ ही 'धरती के अंत' की मुनादी कर रहे थे। पर्दे पर चीखते-चिल्लाते कुछ सूटे़ड-बूटेड टाईयुक्त पत्रकारनुमा लोग डरावने जंगल के वीराने या मौत के खौफ से आच्छादित श्मशान कब्रिस्तान के अघोड़ियों या तांत्रिकों से कम नहीं लग रहे थे। उससे पैदा होने वाली उत्तेजना में छाया ने तो कीटनाशक की दवा खाकर जान दे दी (मरने से पहले उसने पुलिस को बयान भी दिया), लेकिन हजारो-लाखों जानते हैं कि उस पूरे दौर में वे किस तरह तिल-तिल कर मरने के अहसास से गुजरते रहे।

कुछ समय पहले विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली संस्था 'स्पेस' ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया था कि विज्ञान के जिन आविष्कारों का इस्तेमाल अंधविश्वासों के जाले साफ करने में किया जाना चाहिए, उसी का सहारा लेकर आदमी को और अंधा बनाया जा रहा है। सवाल है कि विज्ञान के कंधों पर सवार ये आधुनिक और विकसित-से दिखने वाले 'प्राणी' ऐसा क्यों कर रहे हैं?


दरअसल, जब अक्ल को केवल तिजारत का हथियार बना लिया जाता है तो सारी नैतिकताएं पीछे छूट जाती हैं। अगर बात केवल टीवी चैनलों की करें तो जैसा कि कभी-कभी अंदाजा लगाया जाता है, खेल क्या केवल टीआरपी बढ़ाने का है? एक मकसद यह जरूर है। मगर यह सिर्फ दिखाई देने वाला व्यापार है। इसके पीछे जो महीन और शातिर मिजाज काम कर रहा होता है, एकबारगी उस पर यकीन होना मुश्किल है। लेकिन किसी भी गतिविधि को उसके असर की गहराई की बुनियाद पर आंका जाना चाहिए।

कई बार लगता है कि जादू-टोना और झाड़-फूंक के चमत्कार से मन की साध पूरी कराने का दावा करने वाले ओझाओं और टीवी चैनलों या अखबार में इस तरह की खुराक परोसने वाले संचालक एक ही पायदान पर खड़े हैं और उन्हें समाज के मनोविज्ञान की गहरी समझ होती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति या समाज का मनोविज्ञान उसका सांस्कृतिक परिवेश तैयार करता है। अनंत ब्रह्मांड में सैर करती हमारी कल्पनाएं और जीवन की सीमाओं के बीच झूलती उम्मीदें और मायूसियां। जिन चीजों तक हमारी पहुंच होती हैं और जो किसी भी तरह से हमारे सामने मुहैया हो जाती हैं या जो कम-से-कम साक्षात हैं, उससे इतर कुछ भी पाने के लिए तो चमत्कार का ही आसरा है न! पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही चमत्कार या अदृश्य शक्तियों की धारणाएं हमारी चेतना में इस कदर गहरे पैठी होती हैं कि तुरत-फुरत कुछ हासिल कर लेने की हसरत या एक छोटी नाकामी भी हमें बेबस या लाचार बना देती है। फिर शुरू होता है दिमागी काहिली का दौर, जो जिंदगी को आखिरकार चमत्कार के रहमोकरम पर ले जाकर छोड़ देता है।

और चमत्कारों या अदृश्य दुनिया के खयाल का तिजारत करने वाले लोग हमारी उसी बेबसी का शोषण करते हैं। हम बिल्कुल भरे-पूरे, हर तरह से खुद को सेहतमंद महसूस करेंगे, लेकिन ज्यों ही हमें बताया जाएगा कि 'स्वर्ग जाने वाली सीढ़ियां खोज ली गई हैं', हम तुरंत ही अपनी उस ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाते हैं जो हमारे दिमाग में सोच का एक हिस्सा बना बैठा होता है। 'मर्दखोर परियां' एकबारगी हमें जन्नत की हूरों के साथ फूलों की सेज पर ला पटकती हैं। सीता से जुड़ी जगहों को श्रीलंका में खोज लेने की खबर आती है और तत्काल हम खुद को 'तथास्तु' कहते हुए 'श्रीराम' के सामने पाते हैं। भूतों की लड़ाई की 'लाइव कवरेज', रावण की वायुसेना और हवाईअड्डों पर 'ब्रेकिंग न्यूज' हमारी कल्पनाओं की पुष्टि करते लगते हैं। कुछ समय पहले एलियंस 'धरती पर हमला' करने आ रहे थे। ये सारी बातें 'शोधकर्ताओं' के हवाले से कही जाती हैं, ताकि इन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय बनाया जा सके। शकुन-अपशकुन पर आधारित कर्मफल का ब्योरा देता ज्योतिषि केवल कमाई नहीं कर रहा होता है। वह खूब जान रहा होता है कि इन सबसे कैसे उसका वर्गहित कायम रहता है और सामाजिक शासन और शोषण-परंपरा की बुनियाद और मजबूत होती है।

हमारी त्रासदी केवल पंडे-तांत्रिक या मीडिया तक ही सीमित नहीं है। तल्ख हकीकतों से लबरेज 'सत्या' जैसी फिल्म बनाने वाले रामगोपाल वर्मा 'फूंक' बना कर यह खुली चुनौती पेश करते हैं कि अगर कोई थियेटर में अकेले इस फिल्म को देख लेगा तो उसे पांच लाख रुपए ईनाम के तौर पर दिए जाएंगे। 'फूंक' में भूत-प्रेत या भगवान में यकीन नहीं रखने वाले नायक के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान और एक प्रगतिशील सोच को हारते और 'काला जादू' को जीतते दिखाया गया है। यह हजारों सालों से 'काला जादू' की गिरफ्त में जीते समाज के भावनात्मक शोषण के अलावा और क्या है?

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी। विज्ञान की बुनियाद पर अपनी पहचान कायम करने वाले एक पूर्व राष्ट्रपति से लेकर इस देश के कई शीर्ष नेताओं तक को 'चमत्कारी बाबाओं' के पांव पखारने में शर्म के बजाय गर्व ही महसूस होता रहा है। मानव संसाधन विभाग (यह मंत्रालय देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है) के एक पूर्व राज्यमंत्री ने तो बाकायदा ओझाओं-तांत्रिकों का सम्मेलन ही करा डाला था। हाल ही में एक विधायक ने एक बड़े आयोजन में 265 भेड़ों की बलि दी, क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में खतरे में पड़ी यूपीए सरकार 'किसी तरह' विश्वासमत में जीत सकी। कुछ विधायकों की उनके कार्यकाल में अलग-अलग कारणों से हुई मौत के चलते विधानसभा भवन को भूत-प्रेत से ग्रस्त मान लिया जाता है। यह महज संयोग नहीं है कि ज्योतिष शास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। देश को नेतृत्व देने का दावा करने वाले ऐसे राजनेताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे देश-समाज कितना पीछे जाता है या आधुनिक दुनिया में देश की कैसी छवि बनती है।

सवाल है कि अगर कोई तांत्रिक या व्यक्ति किसी बच्चे की बलि देता है तो उसके लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार हैं? सुना है कि कानून अपराध के लिए प्रेरित करने वाले को भी अपराधी ही मानता है। तांत्रिकों-ज्योतिषियों सहित ताजा फिल्में- 'फूंक' या '1920' जैसी फिल्में बनाने वाले ऐसे लोगों को क्या अंधविश्वासों और सामाजिक जड़ता को बनाए रखने का अपराधी नहीं माना जा सकता? इनके लिए कौन-सा कानून लागू होता है?

यह सब जवाहरलाल नेहरू के उस देश में हो रहा है, जो समाज को एक वैज्ञानिक सोच की जमीन पर खड़े होकर देखना चाहते थे।

हाल ही में एक अति पिछड़े माने जाने वाले समाज की एक सांस्कृतिक गतिविधि के साक्षात के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि किस तरह करीब हजार लोगों की भीड़ के बीच भयानक उन्माद पैदा करते ओझाओं ने भेड़ों की बलि दी और उसके खून से खुद को नहाया। यह सुदूर देहात के एक पिछड़े इलाके की घटना है। लोग भूले नहीं होंगे कि सारी आधुनिकताओं से लैस देश की राजधानी के एक उपनगर गाजियाबाद में, जो संयोग से 'हाईटेक' भी घोषित हो चुका है, तीन बेटों ने अपनी मां की पीट-पीट कर इसलिए बलि दी क्योंकि एक तांत्रिक ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। लेकिन विज्ञान की डिग्रियों की मार्फत इंजीनियर या डॉक्टर बने उन बेटों की मूढ़ता और त्रासदी पर हमक्या अफसोस जताएं। हमारे देश के अंतरिक्ष शोध संस्थान, यानी 'इसरो' का मुखिया जब पीएसएलवी जैसे अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण के लिए मंदिरों में पूजा आयोजित करता है और भगवान से खुद को कामयाब करने की याजना करता है (http://www.telugupeople.comnews/article_00062737_ISRO_chief_visits_Tirumala_prays_for_successful_GSLV_launch.asp) तो एक पिछड़े समाज के सामने ओझाओं के उस उन्माद प्रदर्शन पर कौन-सा सवाल उठाया जाए?

दूरदराज के इलाकों में बहुत सारे मां-बाप अपने बच्चों की ओर आज भी यह जुमला उछालते हुए मिल जाएंगे कि 'देह बढ़ गया और दिमाग वहीं रह गया।' तो क्या हमारा समाज आधुनिकता की तमाम ऊंचाइयों को छूने की कोशिश के बावजूद अब भी किसी एक जगह पर ठहरा हुआ है? या उसे जड़ बनाए रखने की साजिश चल रही है? क्यों हम अब तक ऐसा कोई कारगर कानून बना सकने में नाकाम रहे हैं जो ओझाओं-तांत्रिकों, ग्रह-नक्षत्रों का पाठ पढ़ाने वाले ज्योतिषियों, चमत्कारों और अमूर्त दुनिया के किस्से परोसने वाले मीडिया आदि के ठगी के धंधे से समाज को बचा सकें?

इन सवालों के जवाब शायद विश्व हिंदू परिषद के 'अंतरराष्ट्रीय मुख्यमंत्री' रहे प्रवीण तोगड़िया के उस बयान में मिल जाते हैं, जो उन्होंने कुछ साल पहले गोलवलकर गुरु के सौंवे जन्म दिवस के मौके पर आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' में दिया था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए अंधविश्वास विरोधी कानून के मसले पर उनका कहना था कि हिंदुओं को इस कानून का विरोध करना चाहिए क्योंकि यह हिंदुत्व को खत्म करने की साजिश है। साफ है कि एक तरह से वे यह भी कर रहे थे कि हिंदुत्व की बुनियाद इन अंधविश्वासों पर ही टिकी है और अंधविश्वासों का खत्म होना, हिंदुत्व के खत्म होने जैसा ही होगा। और विहिप का 'हिंदुत्व' कया है, क्या यह किसी को बताना होगा?

यह केवल हिंदुओं के धर्म-ध्वजियों का खयाल नहीं है। सभी धर्म और मत के 'उन्नायक' यही कहते हैं कि सवाल नहीं उठाओ, जो धर्म कहता है, उसका अनुसरण करो। और हमारे भीतर का भय बाहर आने के लिए छटपटाते सारे सवालों की हत्या कर देता है। हमारी विडंबना यह है कि जिनसे हम सवाल उठाने की उम्मीद कर रहे होते हैं, वे खुद एक ऐसा मायावी लोक तैयार करने में लगे होते हैं, जहां कोई सवाल नहीं होता।


इसमें कोई शक नहीं कि देश-दुनिया से रूबरू कराने में टीवी चैनलों ने हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन असली मुश्किल यह है कि लगभग सारी प्रस्तुतियों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो हमें घटनाओं के विश्लेषण की ताकत देता हो। हम देश-दुनिया को देखें, मगर उसी निगाह से, जिससे हमें दिखाया जाता है। तो क्या यह मीडिया की सीमा है कि वह कुछ 'नया' देने के नाम पर हमें और 'पुराना' बना रहा है? क्या मीडिया इस बात से अनजान है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, प्रलय-चमत्कार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम का एकमात्र असर सामाजिक यथास्थिति और जड़ता को कायम रखना है?

मकसद सिर्फ यह है कि समाज सोचने और सवाल उठाने के दौर में न पहुंचे। ऐसे कार्यक्रम परोसने वाले और ऐसी गतिविधियां चलाने वाले धर्मध्वजी यह खूब जानते हैं कि जिस समाज ने सवाल उठाना शुरू कर दिया, उनमें चमत्कारों और तकदीर बताने की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए दिमाग पर पड़े जाले बनाए रखने और नए-नए डिजाइन में नए जाले पेश करने का खेल जारी है। साधना या संस्कार जैसे चैनलों की तो बात छोड़ दें, प्रगतिशील कहे जाने वाले समाचार चैनलों के साथ-साथ इस खेल में हर वह तबका शामिल है, जो दुनिया को दिशा देने का दावा करता है।

कुछ ही समय पहले एक टीवी चैनल के मुखिया ने इस तरह के पाखंडों वाले कार्यक्रम दिखाने के मसले पर साफ जवाब दिया कि मुझे इस बात के लिए कतई शर्मिंदगी नहीं है। शायद वे सही कह रहे थे। इससे इतना तो जाहिर होता ही है कि जो कुछ हो रहा है, वह अनायास बिल्कुल नहीं है। एक सजग और सचेत समाज केवल यह नहीं देखेगा कि 'क्या' है, बल्कि वह उस 'क्या' के 'क्यों' की भी मांग या खोज करेगा। लेकिन सिर्फ 'क्या' परोस कर 'क्यों' का सवाल सिरे से गायब कर देने की कोशिश लगातार और सायास तरीके से चल रही है।